पावरलूम उद्योग में कार्यरत मुस्लिम श्रमिकों का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन (मऊ जिले के विशेष संदर्भ में)
डाॅ. उपेन्द्र प्रसाद सिंह1, रूचि कुमारी2
1प्राध्यापक (समाजशास्त्र), शा. स्वामी विवेकानंद महाविद्यालय त्योंथर, जिला रीवा (म.प्र.)
2शोधार्थी (समाजशास्त्र), शा. ठाकुर रणमत सिंह, महाविद्यालय रीवा (म.प्र.)
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बसे पारवलूम श्रमिक अपनी विपन्नता पर आँसू बहा रहे हैं। मऊ जनपद में पावरलूम उद्योग से जुड़े अधिकतर श्रमिक मुस्लिम समुदाय के है। जिनका वर्ग अंसारी, और मसूरी है, जिसमें अंसारीों की संख्या अधिक है। जिले में केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा बुनकर समुदाय के लोगों के लिए छोटी-बढ़ी योजनाएं संचालित है पर इसका उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। योजनाओं के लाभ के लिए कार्यालयों का चक्कर लगाना और सम्बन्धित विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की मांगे पूरी करने के अलावा आवश्यक खानापूर्ति के बाद मिलने वाली राशि इस लायक नहीं रहती है उसके माध्यम से वे अपनी व्यवसाय को उन्नत बना सके। मऊ जनपद के पावरलूम उद्योग के लिए विकास के लिए जो कार्यालय लागू किया गया है वह विकास कार्यक्रम कागजी घोड़ो पर आर्थिक, सामाजिक, पावरलूम उद्योग के विकास, रोजगार के विकास कार्यक्रम लागू किये गये हैं। लेकिन आज भी ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है। तत्पश्चात भावी विकास की रणनीति तय की जायेगी। इस जनपद में सैकड़ों वर्षों तक फलने-फूलने वाला हथकरघा एवं पावरलूम उद्योग जिले के कुछ ही क्षेत्रों जैसे घोसी, चिरैयाकोट, कोइरियापार, मोहम्मदाबाद आदि में देखने को मिल रहा है। बड़ी कम्पनियों के प्रवेश और औद्योगीकरण के कारण पारम्परिक श्रमिकों का बुरा हाल है। उनके सामने स्वास्थ्य, शिक्षा और भरण पोषण की समस्या पैदा हो गयी है। पावरलूम उद्योग के क्षेत्र में आये बदलाव के साथ श्रमिकों की आर्थिक स्थिति एवं अन्य विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में आये बदलाव, वर्तमान वस्तुस्थिति का यथार्थ आकलन वर्तमान शोध का अभिष्ट अंग है।
KEYWORDS: पावरलूम उद्योग, मुस्लिम श्रमिक, आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति।
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देश में इस्लामिक सत्ता के विकास के साथ बुनकरों की नई जमात आई जिन्होंने अपने भरण पोषण के माध्यम बनुकरी को अपनाया। मऊ जिले का मुख्य उद्योग पावरलूम है। पावरलूम उद्योग में कार्य करने की एक बड़ी संख्या मुस्लिमों की है तथा उनके द्वारा कपडा निर्माण करने में मजदूर कारीगर एवं बुनकरों की एक बड़ी संख्या शामिल है और मुस्लिम बुनकर इस पेशा को पीढ़ी दर पीढ़ी कार्य करते है क्योंकि उनके जीवन यापन का मुख्य श्रोत है। मऊ जिले में बुनाई की शुरूआत मुगलकालीन सम्राट जहाँगीर के समय से कलात्मकता का प्रभाव वस्त्र निर्माण में पड़ा और बुनकरों का एक महत्वपूर्ण शुरूआत हुई। मऊ जिले के मुस्लिमों का मुख्य रोजगार बुनाई है। मऊ जिले के पहचान के रूप में यहाँ की बुनाई कला आज यहाँ की संस्कृति की और आबो-हवा में घुल चुकी है। मऊ जिले में हथकरघा की शुरूआत 16वीं सदी मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि यहाँ तानसेन नाम का एक बुनकर हथकरघे से काफी सुन्दर कपड़ा बनाता था। जिससे कपड़ा बनाने की कला काफी लोगों ने सीखी। तब से लेकर आज तक मऊ के काफी लोगों का प्रमुख रोजगार बुनाई ही है। पावरलूम उद्योग के लिये चर्चित मऊ जिला 19 नवम्बर, 1988 में अस्तित्व में आया। इसके पहले यह क्षेत्र गाजीपुर एवं आजमगढ़ का भाग था। प्राकृतिक संशाधनों वाला यह जिला कृषि एवं पावरलूम के लिये जाना जाता है। जिले का मुख्य व्यवसाय कृषि, पावरलूम, हथकरघा उद्योग है। जनपद की एक चैथायी आबादी हथकरघा एवं पावरलूम उद्योग से सम्बद्ध है। गऊ जिला एक कृषि प्रधान जिला है। यहाँ नगरी क्षेत्रों में औद्योगिक इकाईयों के रूप में छोटे पावरलूम अधिक मात्रा में संचालित होता है। माध्यम व बड़े आकार के उद्योग का अभाव है। केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से पिछड़े की श्गश् श्रेणी में रखा गया है। मऊ जिले के निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। कृषि के अतिरिक्त कुछ घरेलू व कुटीर उद्योग तथा परम्परागत व्यवसाय भी है। जो कि अर्थ विकसित अवस्था में विद्यमान रहता है।
मऊ जिला हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है लेकिन मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति पर्याप्त है। इनकी जनसंख्या लगभग 19,43 प्रतिशत है। मऊ जिले की कुल जनसंख्या लगभग 2204170 है तथा 428619 मुस्लिम है, जो मुख्यतः बुनकर है। बहुत कम मुस्लिम परिवार है जो इस पावरलूम पेशे से बाहर जाकर व्यवसाय करता है। शहरी क्षेत्रों में मुस्लिम परिवार की संख्या लगभग 256529 अर्थात कुल मुस्लिम समुदाय की संख्या का 59.85 प्रतिशत है तथा मुस्लिम समुदाय के ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने की जनसंख्या लगभग 172920 है और ग्रामीण मुस्लिम समुदाय का प्रतिशत 40.15 है। रोजगार के क्षेत्र में मऊ जिले में हथकरघा, पावरलूम उद्योग कृषि के पश्चात् रहते है। जहाँ पर अधिक संख्या में श्रमिक कार्य करते है। कृषि की भाँति पावरलूम उद्योग में कुशल, अर्धकुशल एवं अकुशल श्रमिक कार्य करते हैं। उत्तर प्रदेश के मऊ, वाराणसी, आजमगढ़, गाजीपुर अन्य जिलों में पावरलूम उद्योग लम्बे अर्शे से चला आ रहा है। वर्तमान समय में हथकरघा की जगह पावरलूम उद्योगों में वृद्धि हो रही है। ऐसे श्रमिक जो बाहर जाकर कोई काम नहीं कर पाते उनके लिए कुछ पूँजी संचित करके स्वयं संयन्त्र लगाकर आर्थिक उपार्जन किया जा सकता है। 1957 में जनपद में आये पूर्व प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यहाँ के उद्योग को देखते हुए इसे भारत का मैनचेस्टर कहा था। यहाँ का कपड़ा उद्योग देश-विदेश में अपनी पहचान बनाने वाला जिला है। पावरलूम उद्योग की उपेक्षित व्यवस्था की अभाव की मार इस उद्योग पर पड़ रही है। जिससे उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। गऊ के पावरलूम बुनकरों के सामने अपने अस्तित्व को बनाये रखने की चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार की इस बेरुखी से पिछड़ता चला गया। पावरलूम हैण्डलूम, एसोसिएशन का कहना है कि लगातार कम होती आय में बुनकरों को अन्य व्यवसाय के विकल्प तलासने को मजबूर कर दिया है। जिले में पावरलूम कारोबारियों की संख्या कभी एक लाख से अधिक थी। लेकिन मंदी के मार के चलते पावरलूम उद्योग में मानव संलग्नता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। पावरलूम में ज्यादातर छोटी इकाईयों है। एक छोटे निवेश के साथ व्यापार चलाते है। इस वजह से वह अपनी उन्नयन और आधुनिकीकरण करने की स्थिति में नहीं होते हैं। पावरलूम में छोटे मुस्लिम निवेशक परेशान है। और अपनी जीविका चलाने के लिए पावरलूम उद्योग में लगे रहते हैं।
बुनकरों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार ने कई योजनाएं संचालित कर रखी है। हथकरघा एव पावरलूम से उत्पन्न वस्त्रों की बिक्री के लिए प्रतिवर्ष मेलों का आयोजन किया जाता है। 18 वर्ष से 59 वर्ष के आयु वर्ग के बुनकरों को प्राकृतिक मृत्यु या दुर्घटना मृत्यु की स्थिति में बीमा सुरक्षा लाभ प्रदान किया जा रहा है। प्रदेश के बुनकरों को विभिन्न पुरस्कारों द्वारा सम्मानित भी किया जाता रहा है। सन् 2007-08 में राज्य सरकार द्वारा पावरलूम क्षेत्र के विकास हेतु प्रोत्साहन योजना प्रारम्भ की गई तथा एस०एन०डी० (ैण्छण्क्ण्) के माध्यम से स्वीकृत करायी गयी। मुख्यमंत्री के राज्य सेक्टर में यह योजना लागू की गयी। जिसमें पावरलूग क्षेत्र के बुनकरों के कपड़ा उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई है। इन सब प्रचूर योजनाओं के बावजूद इन उद्योगों से जुड़े श्रमिकों के जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार की स्थिति नहीं दिख रही है। अकेले मऊ जनपद में लगभग 14 हजार हथकरघा कार्यरत है, जिनमें 30 हजार श्रमिक परिवार संलग्न है। ऐसे ही सम्पूर्ण जिला में 86000 श्रमिक परिवार पावरलूम उद्योग में लगे है और 59000 पावरलूम मशीने कार्यरत है। इतनी प्रचुर संख्या में श्रमिकों के कार्यरत होने के बावजूद उन्हें कोई व्यवहारिक सहायता राशि या सुविधाएं उपलब्ध नहीं करायी जाती है, जिसके कारण उनका सामाजिक एवं आर्थिक स्तर लगातार गिरता जा रहा है।
मऊ जिले के मुस्लिम पावरलूम श्रमिकों की सामाजिक, आर्थिक दशा संतोषजनक नहीं है। आजादी के बाद चलाये गये विभिन्न जन उत्थान कार्यक्रमों के बावजूद अभी यहाँ के पावरलूम व्यवसायी अभी भी पुरातन पंथी जीवन जी रहे है। क्षेत्रीय अध्ययन के दौरान देखा गया कि परम्परागत व्यवसाय में संलग्न मऊ जिले के मुस्लिम पावरलूम श्रमिकों की स्थिति अभी दयनीय है। पावरलूम उद्योग से जुड़े अधिकतर श्रमिक मुस्लिम समुदाय से है। जिनका वर्ग अंसारी और मसूरी हैं, जिनमें अंसारी की संख्या अधिक है। प्रस्तुत शोध पावरलूम उद्योग में लगे मुस्लिम श्रमिकों पर केन्द्रित है। वर्तमान अध्ययन में इस उद्योग से जुड़े श्रमिकों के पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन में होने वाले परिवर्तन की दिशा एवं दशा की वस्तुस्थिति ज्ञात करने का प्रयास किया गया है।
शोध का क्षेत्र:-
प्रस्तुत शोध कार्य उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के पावरलूम उद्योग में कार्यरत मुज्ञिद्यस्लम श्रमिको के विशेष संदर्भ में प्रस्तावित है चयनित क्षेत्र में स्थापित 100 मुस्लिम श्रमिकों को इस शोध कार्य में सम्मिलित किया गया है। मुस्लिम श्रमिकों को प्रतिदर्श के रूप में चयनित किया गया है और इन चयनित क्षेत्र में मुस्लिम श्रमिकों से जुडे पहलुओं एवं घटकों को प्राथमिकता एवं साक्षात्कार की परिधि में लाया गया है। इसके अतिरिक्त मुस्लिम श्रमिकों की संरचना एवं उनसे जुड़े पहलुओं का विकासखण्ड और ग्रामीण स्तर पर अध्ययन को सम्मिलित करते हुए एवं प्रस्तुत अध्ययन में मुस्लिम श्रमिकों की व्यवस्था की कार्यशैली का मूल्यांकन सम्मिलित है और मुस्लिम श्रमिकों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए आवश्यक सुझाव किये गये है तथा मुस्लिम श्रमिकों की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन किया गया है।
शोध के उद्देश्य:-
प्रत्येक अध्ययन अपने आप में उद्देश्यपूर्ण होता है। इस शोध में निम्नलिखित उद्देश्य है:-
1. पावरलूम श्रमिकों के शिक्षा एवं पारिवारिक स्वरूप का अध्ययन करना ।
2. पावरलूम उद्योग में वर्तमान पीढ़ी में विगत दो पीढि़यों की तुलना में सामाजिक, आर्थिक स्थिति में उत्पन्न होने वाली गतिशीलता का अध्ययन करना।
3. पावरलूम उद्योग में संयुक्त और एकाकी परिवार तथा ग्रामीण एवं नगरीय पृष्ठभूमि के अन्तर को ज्ञात करना।
4. पावरलूम उद्योग में मुस्लिम श्रमिकों का सामाजिक, आर्थिक जनांककीय एवं मानव सलग्नता का अध्ययन करना ।
5. पावरलूम उद्योग मऊ जनपद के ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन करना।
6. पावरलूम उद्योग में मुस्लिम श्रमिकों के पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षणिक तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन करना।
7. केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा बुनकर समुदाय के छोटी-बड़ी योजनाओं का अध्ययन उसके लिए सुझाव प्रस्तुत करना ।
8. पावरलूम उद्योग में मुस्लिम श्रमिकों के सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों, उनकी परम्पराओं तथा आधुनिकता की रूचि अवगत कराना।
9. इस अध्ययन से पावरलूम उद्योग कार्यरत मुस्लिम श्रमिकों के लिए एक नया दृष्टिकोण विकसित होगा जो किसी किसी रूप में न अनुसंधानकर्ताओं एवं योजनाकारों के लिए उपयोग सिद्ध होगा।
उपकल्पना:-
किसी भी अनुसंधान में उपकल्पना का प्रयोग अत्यन्त ही महत्वपूर्ण एवं आवश्यक होता है। उपकल्पना वास्तव में अनुसंधान का आरम्भिक स्तर है, जिसमें अनुसंधानकर्ता अनुसंधान के बारे में कल्पना करता है और बाद में कल्पना सत्य है या असत्य है, इसकी परीक्षा करता है। वर्तमान अन्वेषक अपने अनुसंधान विषय पर निम्नलिखित उपकल्पना का निर्माण किया है।
1. पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण एवं नगरीकरण आदि प्रक्रियाओं के प्रभाव से पावरलूम श्रमिकों में व्यक्तिवादी एवं भौतिकवादी मूल्यों में वृद्धि हुई है जिसके कारण वे संयुक्त परिवार के स्थान पर एकाकी परिवार में रहना अधिक पसन्द कर रहे हैं।
2. कम आय के कारण पावरलूम श्रमिकों की आर्थिक स्थिति दयनीय है और वे ऋणग्रस्तता के शिकार है।
3. निम्न आर्थिक स्थिति एवं ऋणग्रस्तता के कारण सन्तुलित आहार की कमी तथा कुपोषण के फलस्वरूप पावरलूम श्रमिकों में खराब स्वास्थ्य की समस्या है।
4. पावरलूम श्रमिकों के परिवार में शिक्षा का प्रसार हुआ है लेकिन निम्न आर्थिक स्थिति के कारण प्रायः उच्च शिक्षा का अभाव है।
5. पावरलूम श्रमिकों में महिलाओं की भूमिका एवं अधिकार के प्रति सकारात्मक परिवर्तन न हुआ है फिर भी आधुनिकता एवं परम्परा के बीच द्वन्द की स्थिति है।
6. वयस्क मताधिकार तथा चुनावी राजनीति के कारण पावरलूम श्रमिकों में राजनीतिक चेतना उत्पन्न हुई है।
अध्ययन क्षेत्र मऊ जिले में सामाजिक आर्थिक जीवन पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि अध्ययन क्षेत्र में सामाजिक व आर्थिक संरचना में परम्परागत व्यवसायिक इकाईयों को नयी बाजार-उन्मुख इकाइयों ने स्थानापत्र कर दिया है। परिणामतः आजीविका के क्षेत्र .में नये स्रोत और रोजगार के मुक्त अवसर सृजित हुई है। अध्ययन क्षेत्र में ग्रामीण क्षेत्रों से लोग नगरीय क्षेत्रों में पहले अकेले और कुछ समय बाद परिवार के साथ अप्रवासी हो रहे है। मुस्लिम परिवार में पावरलूम उद्योग में मुस्लिम श्रमिको में पत्नी, बच्चो व अन्य सदस्य सम्मिलित होते है। छोटे परिवार में पति, पत्नी बच्चे ही रहते है। मुस्लिम श्रमिको के संयुक्त परिवार में माता-पिता और उनके बच्चो के अलावा उनके बीसों नाते रिश्ते के लोग सम्मिलित रहते है परिवार में नाते रिश्ते के लोग सम्मिलित रहते है। परिवार में पुरूष श्रमिक परिवार का मुखिया होता है। परिवार के पालन पोषण की जिम्मेदारी उस पर होती है। संयुक्त परिवारों की अपेक्षा एकांकी परिवारों की संख्या बढ़ रही है। श्रमिक वर्ग में इस प्रकार के परिवार बहुतायत में पाये जाते है। पावरलूम कारखानों का घर में होना, सरलता से काम मिलने कम आयु में ही इस उद्योग से जुड़ जाते हैं। महिलायें परिवार में बच्चो की देखभाल के साथ छोटे-मोटे समयानुसार कार्य करती है। तो कुछ महिलाओं अन्य स्थानों पर कार्य करती है। मुस्लिम महिलाओं द्वारा आयु अनुसार पर्दाप्रथा तथा धार्मिक परम्परा का निर्वहन किया जाता है। मुस्लिम श्रमिकों की प्रकृति स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार की होती है।
शोध प्रविधि:-
मानव एक जिज्ञासु प्राणी है वह अज्ञात तत्वों का पता लगाने की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ता जा रहा है। सामाजिक घटनायें भी अपने आप में काफी जटिल है एक ही घटना के पीछे अनेक कारण हो सकते है उन सभी कारणों को खोज निकालना कोई सरल कार्य नहीं है। जब सामाजिक क्षेत्र की समस्याओं के हल खोजने का व्यवस्थित प्रयास किया जाता है उसे ही सामाजिक अनुसंधान, शोध अन्वेषण या खोज का नाम दिया जाता है।
शोध कार्य में मुस्लिम श्रमिकों की पारिवारिक समस्याओं से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आकड़ो को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर मूल स्त्रोतो एवं साक्षात्कार अनुसूची द्वारा एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आंकड़े मुस्लिम बुनकर श्रमिकों से संबंधित विभिन्न प्रकाशित- अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, शासकीय प्रतिवेदनों आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं।
तथ्यों का सारणीयन विश्लेषण एवं व्याख्या -
शोधार्थी द्वारा किया गया कोई भी शोघ कार्य सही अर्थो में तभी प्रभावी होते है, जब शोधार्थी द्वारा उस समस्या की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन किया जाये। इसके लिये यह आवश्यक है कि शेाधार्थी द्वारा शेाध अध्ययन मेें उपयोग किये गये समस्त शेाध उपकरण द्वारा प्राप्त जानकारियों को व्यवस्थित क्रम में सारणीबद्ध किया जाये।
मुस्लिम परिवार के अधिकांश सदस्य पावरलूम उद्योग की विभिन्न प्रक्रिया में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहते है और अपनी जीविका चलाते है। मुस्लिम श्रमिक वर्ग में एकांकी परिवार बहुताय में पाये जाते है। प्रस्तुत अध्ययन में पावरलूम उद्योग में कार्यरत श्रमिको के परिवार के सम्बन्ध में संकलित तथ्यों को सारणी 1 के अन्तर्गत दिया गया है।
स्रोत - सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी के आधार पर
सारणी संख्या 1 के अन्तर्गत दिये गये तथ्यों से स्पष्ट होता है कि 72.67 प्रतिशत पावरलूम श्रमिक एकांकी परिवार के है जबकि 21.33 प्रतिशत पावरलूम श्रमिक संयुक्त परिवार से है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि अधिकांश पावरलूम श्रमिक एकांकी परिवार से सबन्धित है।
मऊ जिले में पावरलूम श्रमिको की शिक्षा एवं परिवार के स्वरूप से सम्बन्धित तथ्यों का विवरण सारणी संख्या 2 में दिया गया है।
स्रोत -सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी के आधार पर
मुस्लिम पावरलूम श्रमिकों की शिक्षा एवं पारिवारिक स्वरूप से सम्बन्धित तथ्यों के विश्लेषण से यह ज्ञात होता है कि अधिकांश निरक्षण निरक्षर श्रमिक एकाकी परिवार से है। जिनकी संख्या 70 प्रतिशत है अशिक्षित श्रमिको की संख्या एकांकी परिवार में बढ़ी है लेकिन संयुक्त परिवार में इनकी संख्या 36 (30ः) है। तालिका में कक्षा 01 से 05 तक पढ़ने वाले एकांकी परिवार की संख्या 63 (67.57ः) है तथा कक्षा 06 से 10वीं तक पढ़ने एकांकी परिवार में 41(65.57ः) है तथा संयुक्त परिवार मंे 22 (34.06ः) है। तथा 10वीं से अधिक पढ़ने वाले श्रमिक 14 (56ः) है तथा संयुक्त परिवार में पढ़ने वाले भी की संख्या 09 (44ः) प्रतिशत है। मुस्लिम परिवार में पढ़ाई के प्रति रूचि कम है। इनमें महिलाओं की शिक्षा का प्रतिशत पुरूषों की अपेक्षा कम है। क्योंकि अल्प आयु में लड़कियो की शादी हो जाती है। तथा समाज से परम्पराओं के निर्वहन मंे पूर्ण सहमति परिवर के सम्पूर्ण सदस्यो की होती है? मुस्लिम परिवार में भी शिक्षित श्रमिकांे की संख्या की एकांकी में ज्यादा है तथा संयुक्त परिवार में कम है। इस प्रकार कहा जा सकात है कि अशिक्षित भी एकल परिवार को पसंद करते है।
स्रोत - सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी के आधार पर
उपरोक्त तालिका के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि 28 वर्ष से कम एकांकी परिवार के श्रमिकों की संख्या 78 (69.29) प्रतिशत तथा युक्त परिवार के 34 (30.71) प्रतिशत पावरलूम उद्योग में श्रमिक के परिवार संयुक्त प्रकृति है। 29 से 38 वर्ष के आयु वर्ग के पावरलूम श्रमिक एकांकी परिवार के 85 (70.43) प्रतिशत तथा 36 (29.57) प्रतिशत संयुक्त परिवार के है। 39 से 48 वर्ष के श्रमिक एकांकी परिवार 38 (77.82) प्रतिशत और 11 (22.18) प्रतिशत, और 49 से ऊपर से आयु के वर्ग के श्रमिक एकांकी परिवार की संख्या 12 (66.67) तथा संयुक्त परिवार के संख्या 06 (33.33) प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि नयी पीढ़ी के अधिकांश पावरलूम श्रमिक एकांकी परिवार से सम्बन्धित है जबकि पुरानी पीढ़ी के अर्थात् 49 वर्ष से ऊपर के आयु वाले पावरलूम श्रमिको मंे अधिकांश संयुक्त परिवार से सम्बन्धित है।
मऊ जिले में विभिन्न असंगठित उद्योगों में कार्य कर रही पावरलूम श्रमिको के परिवार के सदस्यों के संख्या के सम्बन्ध में तथ्यों का संकलन किया गया है। संकलित आंकड़े तालिका संख्या 4 के अन्तर्गत दिये गये है।
स्रोत - सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी के आधार पर
उपरोक्त तालिका 4.4 में दिये गये पावरलूम श्रमिकों के परिवार के सदस्यो की संख्या के आधार पर दिये गये विवरण से कहा जा सकता है कि पांच तक सदस्यो की संख्या 34.33 प्रतिशत, 6 से 8 सदस्यों वाले 37.33 प्रतिशत 9 से 11 सदस्यों वाले 19.66 प्रतिशत और बारह से ऊपर वाले सदस्य 8.67 प्रतिशत परिवार है। उपर्युक्त तालिका के आधार पर कहा जा सकता है कि अधिकांश श्रमिक पावरलूम परिवार में 6 से 8 सदस्य है, जबकि 8 से अधिक सदस्यों वो परिवार बहुत कम है।
पावरलूम श्रमिको के कार्य करने से परिवार में उनके महत्व से सम्बन्धित तथ्यों का विवरण तालिका क्रमांक 5 में दिया गया हैं।
पावरलूम श्रमिको का परिवार के महत्व से सम्बन्धित तथ्यो के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 52.67 प्रतिशत पावरलूम श्रमिको का कथन है कि परिवार में उनका महत्व बढ़ा है। जबकि 10.33 प्रतिशत पावरलूम श्रमिको का महत्व घटा है और 37 प्रतिशत पावरलूम श्रमिको ने कहा कि परिवार में उनके स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
स्रोत - सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी के आधार पर
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि श्रमिक महिलाओं के परिवार के परम्परागत व्यवसाय से सम्बन्धित संकलित तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि अधिकांश श्रमिक का परम्रागत व्यवसाय पावरलूम है। तथा 15 प्रतिशत मुस्लिम परिवार का व्यवसाय हैण्डलूम और 10.33 प्रतिशत व्यवसाय मुस्लिम परिवार के जीविकोपार्जन का साधन है नौकरी बहुत कम श्रमिक का परम्परागत व्यवसाय है जिनकी संख्या 04 प्रतिशत है। अतः स्पष्ट यह कहा जा सकता है कि पावरलूम ही अधिकांश श्रमिको का परम्परागत व्यवसाय है।
निष्कर्ष:-
मऊ जिले में कृषि के बाद पावरलूम महत्वपूर्ण उद्योग है। कृषि के लिए जहाँ केन्द्र व राज्य सरकारे अनेक सुविधायें एवं संसाधन उपलब्ध करा रही है वही पावरलूम उद्योग अभी इससे अछूता है। जिससे जिले की एक बड़ी आबादी की संलग्नता के बावजूद यह उद्योग उपेक्षित है यही नहीं इस उद्योग से जुड़े जनमानस के सामने मंहगाई और आधुनिकता के जमाने में भरण-पोषण की समस्या तो है ही अर्थाभाव के कारण नितनई समस्या उनके सामने आ खड़ी होती है जिले के बुनकरोकी समस्याओं की ओर देखे तो, जाहिर होता है कि बुनकर श्रमिको के सामने कई प्रकार की समस्यो मुहबाये खड़ी रहती है। कुछ समस्याओं का सम्बन्ध परिवार और समाज से है तो कुछ का उनके शिक्षा से। पारिवारिक-सामाजिक समस्याओ को बुनकर श्रमिक इतनी गम्भीरता से नहीं लेते है। श्रमिको का मानना है कि परिवार, समाज और शिक्षा की समस्याओं का समाधान कही न कही आर्थिक और स्वस्थ्य जनित समस्याओं में निहित हैं। आर्थिक और स्वास्थ्य जनित समस्याएॅ भी कम नहीं है। क्षेत्रीय अध्ययन के दौरान जो समस्यायें सामने आयी उनमें आर्थिक और स्वास्थ्य जनित समस्यायें प्रमुख है।
केन्द्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा बुनकर समुदाय के लोगों के लिए छोटी-बड़ी कुछ योजनायें संचालित है पर इसका उन्हें कोई अच्छा लाभ नहीं मिल पाता। पावरलूम योजनाअें के लाभ के लिए कार्यालयों का चक्कर लगाना और सम्बन्धित विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की मांगे पूरी करने के अलावा आवश्यक खाना पूर्ति के बाद मिलने वाली राशि इस लायक नहीं रहती कि उसके माध्यम से वे अपने व्यवसाय को उन्नत कर सकें। इसके अलावा बुनकर बाजार में महाजनी व्यवस्था तथा दलालो की सक्रियता और उनकी गतिविधियाॅ भी ऐसी है जो त्वरित सेवा उपलब्ध करानेके कारण बुनकर श्रमिकों को शासकीय योजनाओं से ज्यादा हितकर लगती है। इन सबे अलावा मशीन कच्चे माल, बिजली, स्थान आदि ऐसी समस्यायें है जो बुनकर समुदाय को आगे बढ़ने में अवरोध का काम करती है। शासन के द्वारा कोई भी विशिष्ट नीति बुनकर समुदाय के लिए संचालित न होने तथा बुनकर समुदाय में आवश्यक जनजागरण के अभाव के कारण भी शासन की नीतियों के प्रति उदासीनता का माहौल देखा जाता है।
पावरलूम उद्योग मे कार्यरत बुनकर समुदाय का मानना है कि शासन के द्वारा उन्हें कोई विशेष सहायता प्राप्त नहीं हो पा रही है। जो योजनाएॅ बनती भी है तो उनका लाभ उन्हें यह कह कर नहीं दिया जाता है कि आपका कार्य पावरलूम उद्योग के अन्तर्गत नहीं आता है। क्योंकि आपने लूम मशीन चलाने के एिल मोटर लगा रखा है जबकि यह सच्चाई नहीं है। वे आज भी सारा कार्य हाथो से करते है। मऊ जिले में बुनकरों के पास जुगाड़ लूम है। दूसरी समस्या जो योजनाओ से सम्बन्धित है वह कि अधिकांश योजनाये पावरलूम के लिए बनती है जिसका लाभ वस्त्र उद्योग के लिए बड़े-बड़े फैक्ट्री वाले लोग उठाते है। बेचारे गरीब बुनकर तो हर तरफ से मारे जाते है। जिस कारण वे कारीगर कम श्रमिक ज्यादा दिखते है बुनाई उनके व्यस्थ रहने का आधार है। वह उन्हे अच्छी तरह रेाटी नहीं दे पाता है। यह आर्थिक विपन्नता बुनकर श्रमिको में कई आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, शैक्षणिक, स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को जन्म देती है। ठेकेदार, व्यापारियो, महाजनो ने अपनी स्वयं सिद्धि के लिए यह देखा जाता है कि बुनकरों की अज्ञानता, विवशता मजदूरी, पिछड़ेपन, और अशिक्षा आदि का लाभ उठाकर भरपूर शोषण करते है। इस शोषण ने बुनकर के सामने कई समस्याएं उत्पन्न कर दी है।
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Received on 07.12.2021 Modified on 19.12.2021 Accepted on 27.12.2021 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(4):183-190.
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